श्रीकृष्ण

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्! देवकीपरमानन्दं कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्!!  

English Meaning:  I bow to Lord Krishna, the son of Vasudeva, who was the cause of mother Devaki’s immense happiness, and the one who killed the wicked Kansa and Chanoora, and who is the supreme teacher or the teacher of the universe.

हिन्दी अर्थ : मैं कृष्ण भगवान को नमस्कार करता हूँ, जो कि वासुदेव के पुत्र थे, जो कि माता देवकी की असीम खुशियों का कारण थे, जिन्होंने अन्यायी व अधर्मी कंस और चाणूर का वध किया और जो इस पूरे जगत के गुरु हैं |

श्रीकृष्ण भगवान को जगतगुरु कहते हैं । श्रीकृष्ण भगवान वज्र से भी कठोर थे और फूल से भी सुकोमल थे । श्रीकृष्ण भगवान आततायिओं, अधर्मिओं और नराधमों की हत्या के खिलाफ न थे । ऐसी हत्या करने से वे कभी हिचकिचाये नहीं थे । कंस, शिशुपाल, भौमासुर का वध उन्होंने ही किया था । उनके जीवन दर्शन से यह स्पष्ट होता है कि निर्धन सुदामा का प्रेम भरा स्वागत करनेवाले भी वे ही थे । सभी शिक्षकगण, गीताजी के अध्ययन द्वारा निष्काम कर्मयोगी बनें, निर्भय बनें और जरुरत पर कठोर भी बन सकें, यह जरुरी है । ये सभी सज्जन ही, समाज में से दुर्गंध दूर करने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं । ये बल गीताजी के आचरण में से ही मिल सकता है ।

श्रीमद् भगवद् गीता द्वारा सारे जगत को निष्काम कर्मयोगी और ज्ञानवान बनने का और अन्याय, अत्याचार और अधर्म के सामने जूझते रहने का अनन्य बोध देनेवाले, इस विरल व्यक्तित्व के लिए जगतगुरु शब्द संपूर्ण रुप से यथार्थ है । अधर्म को साथ देनेवाले व्यक्ति हमारे पूज्य महानुभाव हो, अन्य संबंधी हो या कोई भी हो, फिर भी लागणीशील हुए बिना, या उसकी शेहशर्म की परवाह किए बिना, अपना कर्तव्य पालन करना ही चाहिये, ऐसा स्पष्ट मंतव्य व्यक्त करनेवाला परम तत्व विश्ववंद्य ही होगा । अपने कर्तव्य पालन में विनम्रता होनी चाहिये, साथ साथ मक्कमता भी उतनी ही होनी चाहिये । अपने कर्तव्य पालन से शायद गेरलाभ हो, अपयश मिले, या किसीको बुरा लगेगा, ऐसा नहीं सोचना चाहिये । संपूर्ण निष्काम भावना से कर्तव्य पालन करना चाहिये ।

ऐसा अद्भूत उपदेश देनेवाले श्रीकृष्ण भगवान सच्चे अर्थ में जगतगुरु है ।

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